फ़िजी के प्रधानमंत्री सितिवेनी राबुका ने दशकों पुरानी घटना के लिए भारतीयों से मांगी माफ़ी, उस दिन क्या हुआ था आइए और पढ़िए

फ़िजी के प्रधानमंत्री सितिवेनी राबुका ने कहा है कि 1987 में उन्होंने भारतीय मूल के लोगों के ख़िलाफ़ जो तख़्तापलट किया था, वो सही नहीं था. उस समय उन्होंने दावा किया था कि ‘भारत से गन्ने के खेत में काम करने आए लोगों की तादाद वहां से मूल निवासियों से अधिक हो गई है और फ़िजी के लोगों का अपने देश पर नियंत्रण कमज़ोर हो रहा है.’

रविवार को एक ट्वीट में उन्होंने लिखा, “मैं ख़ुद और उन सभी लोगों की तरफ़ से जो मेरे साथ थे, 14 मई 1987 को सैन्य तख़्तापलट के लिए माफ़ी मांगता हूं. हम अपनी ग़लतियों की और इतने सारे लोगों को, ख़ासतौर पर इंडो-फ़िजी लोगों को आहत करने की ग़लती मानते हैं.”

14 मई को घटना के साल पूरे होने पर उन्होंने कहा, “हम उन लोगों को दोष नहीं देते जो हमसे नाराज़ हैं या फिर नफ़रत करते हैं. मैं यहां अपनी ग़लती मानता हूं और लोगों से माफ़ी की ग़ुजारिश करता हूं.”

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1987 में भारतीयों मूल के लोगों के साथ क्या हुआ था

सबसे पहले ये समझते हैं कि फ़िजी में भारतीय पहुंचे कैसे थे. भारत के सुदूर पूर्व में प्रशांत महासागर में स्थित फ़िजी 1874 में ब्रिटेन की कॉलोनी बना था.

1879 से 1916 के बीच वहां भारत से 60 हज़ार से ज़्यादा लोग गन्ने के खेतों में काम करने के लिए लाए गए थे.

1916 में ब्रिटेन की सरकार ने भारत से लोगों को लाना बंद किया और 1920 में मज़दूरों के साथ इंडेन्चर्ड लेबर एग्रीमेंट (अनुबंधित श्रमिक समझौता) को ख़त्म कर दिया गया.

1970 में फ़िजी आज़ाद हुआ और रातू सर कामिसी मारा पहले पीएम चुने गए.

1987 में भारतीय मूल के लोगों के प्रभुत्व वाली सरकार सत्ता में आई. इस वक्त भारतीय मूल के लोगों यानी फ़िजी-इंडियन्स की आबादी वहां के मूल लोगों की आबादी से ज़्यादा थी.

भारतीयों का पलायन

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उसी समय लेफ़्टिनेंट कर्नल सितिवेनी राबुका ने बिना ख़ून ख़राबे वाले एक तख़्तापलट में सत्ता हथिया ली.

उनका कहना था फ़िजी के लोगों का राजनीति में प्रभाव अधिक होना चाहिए. इसके बाद एक और राजनीतिक क़दम उठाते हुए फ़िजी को उन्होंने गणतंत्र घोषित कर दिया.

तख़्तापलट के बाद बड़ी संख्या में फ़िजी से भारतीयों का पलायन हुआ.

30 नवंबर 1987 की  एक रिपोर्ट में लिखा गया, “फ़िजी में हैरान कर देनी वाली बात ये है कि बहुसंख्यक भारतीय समुदाय की ओर से विरोध की राजनीति बिल्कुल नदारद है. साढ़े तीन लाख भारतीयों की आबादी वाले इस देश में कई लोग बाहर जा रहे हैं, बहुत से लोग इसे अपने भाग्य को नहीं बदल पाने वाली गिरावट मान रहे हैं.”

रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे देश में पासपोर्ट एप्लीकेशन की बाढ़ आ गई और एक दिन तो 250 आवेदनों में से 230 भारतीयों के थे.

राबुका अब इसी तख़्तापलट और इन्हीं लोगों पर हुए अत्याचार के लिए माफ़ी मांग रहे हैं.

987 के बाद भी हुए तख़्तापलट

राबुका के दो तख़्तापलट के बाद भी फ़िजी में दो और तख़्तापलट हुए.

1999 में महेंद्र चौधरी फ़िजी के पहले भारतीय मूल के प्रधानमंत्री चुने गए थे.

लेकिन एक साल बाद ही उन्हें दिवालिया व्यवसायी जॉर्ज स्पाइट और सेवानिवृत्त सेना प्रमुख इलिसोनी लिगेयरी ने सत्ता से हटा दिया. इस बार भी उद्देश्य मूल फ़िजियों को प्रमुख राजनीतिक ताक़त बनाना था.

इसके बाद साल 2006 में एक और तख़्तापलट हुआ. इस बार इसे अंजाम देने वाले सेना प्रमुख फ़्रैंक बैनिमरामा ने आरोप लगाया कि सरकार भ्रष्ट है और उन लोगों पर नरम है जिन्होंने साल 2000 के पहले तख़्तापलट किए.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़, राबुका ने एक अख़बार से कहा, “तख़्तापलट पर किसी को गर्व नहीं होना चाहिए क्योंकि आप नायक नहीं बनते हैं, इसलिए इसकी नकल करने वालों को यह नहीं सोचना चाहिए कि वे नायक होंगे.”

उन्होंने कहा, “आइए हम ये सब कुछ पीछे छोड़ दें और इस तख़्तापलट की संस्कृति को रोकें क्योंकि यह विकास और प्रगति में मदद नहीं करता है.”

कब क्या-क्या हुआ

1874 – ब्रिटिश क्राउन के अधीन आया फ़िजी

1879-1916 – भारत से 60,000 मज़दूर लाए गए

1970- फ़िजी आज़ाद हुआ

1987 – दो बार हुआ तख़्तापलट

1999- महेंद्र चौधरी ने जीता चुनाव, फिर हुआ तख़्तापलट

फ़िजी के लिए क्यों महत्वपूर्ण है ये बयान

1987 के बाद से अब तक चार तख़्तापलट झेल झुके इस देश में पिछले साल सितिवेनी राबुका फिर से प्रधानमंत्री चुनकर आए.

उनके बयान से ज़ाहिर है कि और अब उनकी कोशिश देश में शांति और प्रगति लाने की है.

जेएनयू के प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं, “राबुका ने जब तख़्तापलट किया था तो वो युवा थे, अब वो बुज़ुर्ग और परिपक्व हो चुके हैं और उन्हें एहसास है कि अब देश के लिए ज़रूरी है कि सभी को साथ लेकर चला जाए.”

और ये वहां रह रहे भारतीय मूल के लोगों सहयोग के बिना संभव नहीं लग रहा.

जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के नेल्सन मंडेला सेंटर फ़ॉर पीस एंड कॉन्फ़्लिक्ट रिज़ोल्यूशन में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉक्टर प्रेमानंद मिश्रा कहते हैं, “ये माफ़ीनामा जितना भारत के लिए था, उतना ही ज़रूरी ये राबुका के लिए था. ये जताने की कोशिश की गई कि वो सिर्फ़ वहां के मूल निवासियों को ही नहीं, फ़िजी-इंडियन्स को भी साथ लेकर चल रहे हैं.”

स्वर्ण सिंह कहते हैं, “भारत के पीएम नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन 24 मई पापुआ न्यू गिनी में मुलाकात करेंगे. मुझे लगता है कि इस बयान की टाइमिंग इसलिए ज़रूरी है.”

दोनों 22 मई को फ़ोरम फ़ॉर इंडिया-पैसिफ़िक आइलैंड्स कोऑपरेशन समिट (इंडिया पैसिफिक समिट) में हिस्सा लेंगे.

फ़ोरम में14 प्रशांत द्वीप – कुक आइलैंड्स, फिज़ि, किरिबाती, मार्शल आइलैंड्स, माइक्रोनेशिया, नाउरू, नीयू, समोआ, सोलोमन आइलैंड्स, पलाऊ, पापुआ न्यू गिनी, टोंगा, तुवालु और वानुआतु शामिल हैं.

हालांकि अब ख़बर आई है कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने पापुआ न्यू गिनी का अपना दौरा रद्द कर दिया है. उन्होंने ये दौरा अमेरिकी क़र्ज़ संकट की वजह से रद्द किया है.

चीन का जवाब खोजने की कोशिश

फ़िजी चीन, अमेरिका और भारत के लिए महत्वपूर्ण है. पिछले कुछ सालों में चीन फ़िजी समेत कई देशों के क़रीब आया है. चीन इस क्षेत्र में विशेष रूप से ऋण के रूप में अधिक से अधिक पैसा लगा रहा है.

अमेरिका भी अधिक प्रभाव के लिए और चीन के अभियान का मुक़ाबला करने के लिए फ़िजी के साथ घनिष्ठता का प्रयास कर रहा है.

फ़िजी

राजधानी:सुवा

क्षेत्रफल : 18,274 र्ग किलोमीटर

आबादी: 926,200

भाषाफ़िजिअन, अंग्रेज़ी, फ़िजी हिंदी

हालांकि प्रेमानंद मिश्रा के मुताबिक़, राबुका के आने के बाद चीन से रिश्ते ख़राब हुए हैं.

वो कहते हैं, “चीन की दक्षिणी प्रशांत महासागर में स्ट्रैटेजी है. वो लोन से मदद करता है तो छोटे द्वीपीय देशों को लगता है कि चीन के साथ रिश्ते थोड़े रिस्क वाले हैं. भारत के साथ वैचारिक संबंध है, पीपल टू पीपल कॉन्टैक्ट है.”

फ़रवरी में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर जब फ़िजी गए थे तो राबुका ने साफ़ किया था कि वो भारत और चीन दोनों के दोस्त हैं और ये रिश्ता जारी रहेगा.

प्रेमानंद मिश्रा कहते हैं, “इसके अलावा क्लाइमेट चेंज से ये छोटे देश प्रभावित हैं. एशियन डिवेलपमेंट बैंक ने कहा है कि वो इन देशों की मदद के लिए सौ बिलियन डॉलर का एक पैकेज बना रहा है. उन देशों की मदद के लिए जो जलवायु परिवर्तन से बहुत ज़्यादा प्रभावित होंगे. एडीबी में सबसे ज़्यादा प्रभाव अमेरिका और जापान का है. इसलिए ये भी एक कारण हो सकता है.”

भारत के लिए क्या हैं मायने

चीन के मुद्दे को छोड़े दें तो भारत को अभी सीधे तौर पर फ़िजी से बहुत मदद नहीं मिलती. लेकिन अंतरराष्ट्रीय संबंध आने वाले कई सालों को देखकर बनाए जाते हैं.

प्रेमानंद मिश्रा के मुताबिक़, “भारत के नज़रिए से सिर्फ़ एंटी-चीन होना महत्वपूर्ण नहीं है. फ़िजी के साथ भारत के ऐतिहासिक रिश्ते हैं. उस देश के विकास में भारत का योगदान है, वहां की मिलिट्री की ट्रेनिंग भारत में होती है, क्लाइमेंट फ़ाइनेंसिंग में भारत मदद कर सकता है, जलवायु परिवर्तन का मुद्दा उठाने में भारत अग्रणी रहा है.”

इसीलिए ये मुमकिन है कि आने वाले समय में भारत को किसी मुश्किल दौर में फ़िजी की मदद मिल सकती है.

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